Mahabharata

युधिष्ठिर ने कैसे जान लिया कि महाभारत युद्ध में कितने सैनिक तथा योद्धा मरे

महाभारत युद्ध में लाखों की संख्या में योद्धाओं तथा सैनिकों की मृत्यु हो गई थी। दोनों पक्षों को ही घोर क्षति पहुँची थी जो कि किसी भी युद्ध का पूर्व अनुमानित अन्त होता है। परन्तु ये प्रश्न सभी के मन में आता है कि लगभग अनन्त संख्या में मरने वालों की संख्या वास्तव में कितनी थी।

ये प्रसङ्ग महाभारत ग्रन्थ के चतुर्थ खण्ड के स्त्रीपर्व के अन्तर्गत श्राद्धपर्व के छब्बीसवें अध्याय में आता है।

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ये प्रश्न धृतराष्ट्र के मन में भी आया तथा उसने युधिष्ठिर ये प्रश्न पूछा:

जीवतां परिमाणज्ञः सैन्यानामसि पाण्डव।

हतानां यदि जानीषे परिमाणं वदस्व मे।।

अनुवाद: पाण्डुनन्दन। तुम जीवित सैनिकों की संख्या के जानकार तो हो ही, यदि मरे हुओं की संख्या जानते हो तो मुझे बताओ।

ये प्रश्न सुनने में तो अधिक कठिन जान पड़ता है परन्तु युधिष्ठिर ने इसका उत्तर शीघ्र ही बताया:

दशायुतानामयुतं सहस्राणि चि विंशतिः।

कोट्यः षष्टिश्च षट् चैव ह्यस्मिन् राजन् मृधे हताः।।

अनुवादः राजन्। इस युद्ध में एक अरब, छाछठ करोड़, बीस हजार योद्धा मारे गये हैं।

अलिक्षितानां वीराणां सहस्राणि चतुर्दश।

दश चान्यानि राजेन्द्र शतं षष्टिश्च पञ्च त।।

अनुवादः राजेन्द्र। इनके अतिरिक्त चौबीस हजार एक सौ पैंसठ सैनिक लापता हैं।

युधिष्ठिर का ऐसा उत्तर सुन कर धृतराष्ट्र को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने पूछा:

केन ज्ञानबलेनैवं पुत्र पश्यसि सिद्धवत्।

तन्मे वद महाबाहो श्रोतव्यं यदि वै मया।।

अनुवादः पुत्र। किस ज्ञानबल से तुम इस तरह सिद्ध पुरुषों के समान सब कुछ प्रत्यक्ष देख रहे हो। महाबाहो। यदि मेरे सुनने योग्य हो तो बताओ।

युधिष्ठिर ने कहा:

निदेशाद् भवतः पूर्वं वने विचरता मया।

तीर्थयात्राप्रसङ्गेन सम्प्राप्तोऽयमनुग्रहः।।

अनुवादः महाराज। पहले आपकी आज्ञा से जब मैं वन में विचरता था, उन्हीं दिनों तीर्थयात्रा के प्रसङ्ग से मुझे एक महात्मा का इस रुप में अनुग्रह प्राप्त हुआ।

देवर्षिर्लोमशो दृष्टस्ततः प्राप्तोऽस्म्यनुस्मृतिम्।

दिव्यं चक्षुरपि प्राप्तं ज्ञानयोगेन वै पुरा।।

अनुवादः तीर्थयात्रा के समय देवर्षि लोमश का दर्शन हुआ था। उन्हीं से मैंने यह अनुस्मृतिविद्या प्राप्त की थी। इसके अतिरिक्त पूर्वकाल में ज्ञानयोग के प्रभाव से मुझे दिव्य दृष्टि भी प्राप्त हो गयी थी।

यदि आप युधिष्ठिर के जीवन चरित्र को ध्यान पूर्वक पढ़ेंगे तो पायेंगे कि युधिष्ठिर में लेश मात्र भी अभिमान नहीं था। वो सदा बड़ों का तथा ऋषि-मुनियों का आदर किया करते थे तथा जिस किसी से जो भी सीख मिलती वो उसे ले लेते थे।

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