महाभारत काल की मुख्य नदीयों के नाम

महाभारत के तीसरे खण्ड में सञ्जय धृतराष्ट्र को उस समय की मुख्य नदीयों के नाम बताते हैं। वे इस प्रकार हैं–

गङ्गा, सिन्धु, सरस्वती, गोदावरी, नर्मदा, बाहुदा, महानदी, शतद्रू, चन्द्रभागा, महानदी, यमुना, दृषद्वती, विपाशा, विपापा, स्थूलबालुका, वेत्रवती, कृष्णवेणा, इरावती, वितस्ता, पयोष्णी, देविका, वेदस्मृता, वेदवती, त्रिदिवा, इक्षुला, कृमि, करीषिणी, चित्रवाहा, चित्रसेना, गोमती, धूतपापा, महानदी वन्दना, कौशिकी, त्रिदिवा, कृत्या, निचिता, लोहितारणी, रहस्या, शतकुम्भा, सरयू, चर्मण्वती, वेत्रवती, हस्तिसोमा, दिक्, शरावती, पयोष्णी, वेणा, भीमरथी, कावेरी, चुलुका, वाणी, शतबला, नीवारा, अहिता, सुप्रयोगा, पवित्रा, कुण्डली, सिन्धु, राजनी, पुरमालिनी, पूर्वाभिरामा, वीरा (नीरा), भीमा, ओघवती, पाशाशिनी, पापहरा, महेन्द्रा, पाटलावती, करीषिणी, असिक्नी, महानदी कुशचीरा, मकरी, प्रवरा, मेना, हेमा, घृतवती, पुरावती, अनुष्णा, शैब्या, कापी, सदानीरा, अधृष्या, महानदी कुशधारा, सदाकान्ता, शिवा, वीरमती, वस्त्रा, सुवस्त्रा, गौरी, कम्पना, हिरण्वती, वरा, वीरकरा, महानदी पञ्चमी, रथ-चित्रा, ज्योतिरथा, विश्वमित्रा, कपिञ्जला, वेणा महानदी तुङ्गवेणा, विदिशा, कृष्णवेणा, ताम्रा कपिला, खलु, सुवामा, वेदाश्वा, हरिश्रावा, महापगा, शीघ्रा पिच्छिला, भारद्वाजी, नदी, कौशिकी नदी, शोणा, बाहुदा, चन्द्रमा, दुर्गा, चित्र-शिला, ब्रह्मवेध्या, वृहद्वती, यवक्षा, रोही, जाम्बूनदी, सुनसा, तमसा, दासी, वसा, वराणसी, नीला, घृतवती, महानदी पर्णाशा, मानवी, वृषभा, ब्रह्ममेध्या, बृहद्वनि, सदा निरामया, कृष्णा, मन्दगा, मन्दवाहिनी, ब्राह्मणी, महागौरी, दुर्गा, चित्रोत्पला, चित्ररथा, मञ्जुला, वाहिनी, मन्दाकिनी, वैतरणी, महानदी कोषा, शुक्त्तिमती, अनङ्गा, वृषा, लोहित्या, करतोया, वृषका, कुमोरी, ऋषिकुल्य, मारिषा, सरस्वती, मन्दाकिनी, सुपुण्या, सर्वा तथा गङ्गा।

इन नदीयों के नाम बताकर वो ये कहते हैं कि ये सभी नदीयाँ महान हैं तथा पूजनीय हैं। वो ये भी कहते हैं कि इनके अतिरिक्त भारत में सहस्रों और भी नदीयाँ हैं।

वे इन सब नदीयों का नाम लेकर ये बताते हैं कि भारतवासी इस सभी नदीयों का जल पीने हेतु प्रयोग करते हैं। इस से ये सिद्ध होता है कि उस समय भारत की लगभग प्रत्येक नदी का जल पीने योग्य था।

ये अत्यन्त दुःख की बात है कि आधुनिक युग में मनुष्य ने गङ्गा जैसी परम दिव्य नदी के जल तक को प्रदूषित कर दिया तथा उसे पीने योग्य नहीं छोड़ा है।

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