विभिन्न मासों में किये जाने वाले शिवव्रतों का विधान

कौन से महीने में कैसे करें शिव व्रत का पालन

जो ( मनुष्य ) सत्यवादी तथा जितक्रोध  (क्रोध को वश में किया हुआ) होकर पुष्य  (पौष) मास में (शिवका) विधिवत् पूजन करके चावल, गेहूँ और गोदुग्ध से बने हुये भोजन को केवल रात में ग्रहण करता है; दोनों पक्षों की अष्टमी तिथि में यत्न पूर्वक उपवास करता है तथा भूमि पर शयन करता है; और मास के अन्त में पूर्णिमा के दिन घृत आदि से महादेव को स्नान कराकर विधिपूर्वक उनकी पूजा करके श्रेष्ठ ब्राह्मणों को दुग्ध तथा घृत मिश्रित पके हुये यव तथा चावल का भोजन कराता है एवं विशेष रूप से शान्ति मन्त्रों का जप करता है और देवदेव परमेश्वर भव शिव जी को कपिल वर्ण का गोमिथुन (गाय तथा वृषभ) समर्पित करता है वह उत्तम अग्नि लोक को जाता है और अनेक लोकों के सुखों का भोग करके वहीं पर मुक्त्त हो जाता है।

माघ मास में जो पूजन करके केवल नक्त्त भोजन करता है, घृत युक्त कृशर का आहार ग्रहण करता है, इन्द्रियों को वश में किये रहता है, दोनों पक्षों की चतुर्दशी में उपवास करता है, पूर्णिमा के दिन रुद्र को घृत कम्बल अर्पित करता है, कृष्ण वर्ण का गोमिथुन प्रदान करता है, शिव की पूजा करता है, ( अपने ) सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराता है, वह यम लोक पहुँच कर यम के साथ आनन्द मनाता है।

फाल्गुन मास आने पर जो घी तथा दूध में पकाये हुये सावाँ के अन्न का नक्त्त भोजन करता है, इन्द्रियों को तथा क्रोध को वश में किये रहता है, अष्टमी तथा चतुर्दशी के दिन उपवास करता है, पूर्णिमा के दिन महादेव शङ्कर को स्नान करा कर उनकी पूजा करके उन शूलपाणि ( शिव ) को ताम्र वर्ण का गोमिथुन प्रदान करता है और ब्राह्णों को भोजन करा कर परमेश्वर से प्रार्थना करता है, वह चन्द्रमा का सायुज्य प्राप्त करता है; इस में सन्देह नहीं करना चाहिये।

जो चैत्र महीने में रुद्र की पूजा करके घी और दूध से युक्त तथा पके हुये शालि-चावल को अपनी रुचि के अनुसार रात्रि में ग्रहण करता है, रात में गोशाला में भूमि पर शयन करता है, शिव जी का स्मरण करता है, पूर्णमासी के दिन शिव को स्नान कराकर श्वेत वर्ण का गोमिथुन प्रदान करता है और ब्राह्मणों को भोजन कराता है, वह निर्ऋतिलोक को प्राप्त करता है। ।।

वैशाख महीने में नक्त भोजन करके पूर्णमासी तिथि में पञ्चागव्य, घृत आदि से शिव जी को स्नान करा कर श्वेत वर्ण का गोमिथुन अर्पित करके वह ( मनुष्य ) अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है।

ज्येष्ठ मास में देवेश, भव, शर्व, उमापति की श्रद्धा पूर्वक पूजा करके मधु-जल-घृतमिश्रित पवित्र शालि चावल का केवल रात में आहार ग्रहण करके वीर आसन में स्थित होकर आधी रात में गायों की सेवा में तत्पर रह कर पूर्णिमा के दिन देवदेव उमापति को स्नान करा कर उनकी पूजा करके विधान पूर्वक शिव जी को चरु अर्पित करके पुनः अपने सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन करा कर धूम्र वर्ण का गोमिथुन ( शिव जी को ) अर्पित करने से वह वायु लोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।

इसी प्रकार आषाढ़ महीने में भी चीनी, घृत तथा गोदुग्ध मिश्रित सत्तु के नक्त-भोजन में तत्पर रहते हुये पूर्णिमा के दिन घृत आदि से ( शिव जी को ) स्नान करा कर विधि पूर्वक पूजन करके वेद में पारङ्गत श्रोत्रिय ब्राह्मणों को भोजन करा कर जो गौरवर्ण का गोमिथुन अर्पित करता है, वह वरुण लोक प्राप्त करता है।

सावन महीने में दूध मिश्रित षष्टिक ( साठ दिन में उत्पन्न होने वाले शालि चावल ) – के भात का नक्त भोजन करके वृषभ ध्वज की पूजा करके (अन्त में ) पूर्णिमा के दिन घृत आदि से स्नान करा कर विधि पूर्वक उनकी पूजा करके वेद में पारङ्गत श्रोत्रिय ब्राह्मणों को भोजन करा कर जो (मनुष्य) सफेद खुर वाला तथा चितकबरा गोमिथुन शिव जी को अर्पित करता है, वह वायु देव का सायुज्य प्राप्त करता है और वायु के समान सर्वगामी हो जाता है।

इसी प्रकार भाद्र पद महीना आने पर हवन से बची हुई सामग्री का नक्त भोजन करके दिन में वृक्ष के मूल का आश्रय लेकर विश्राम करते हुये ( अन्त में ) पूर्णिमा के दिन देवेश शङ्कर को स्नान करा कर ( उनकी ) पूजा करके भक्त्ति पूर्वक विधि के अनुसार नील वर्ण के स्कन्ध वाला वृषभ तथा एक गाय शिव जी को अर्पित करके वेदे-वेदाङ्ग में पारङ्गत ब्राह्मणों को भोजन करा कर मनुष्य यक्ष लोक प्राप्त करके यक्षों का राजा हो जाता है।

इसके बाद इसी तरह आश्विन मास में केवल रात में घी से बना हुआ भोजन करके पूर्णिमा तिथि में पूर्व की भाँति शङ्कर की पूजा करके ब्राह्मणों तथा सर्वदा पवित्र रहने वाले शिव भक्त्तों को भोजन करा कर नीलवर्ण की आभा वाले तथा उन्नत उरुदेश वाले एक वृषभ और एक गाय का विधि पूर्वक दान करके मनुष्य ईशान लोक प्राप्त करता है।

कार्तिक मास में रात्रि में घृत युक्त दुग्धोदन का भोजन करके भगवान शिवका पूजन कर (अन्त में) पूर्णिमा तिथि में विधि पूर्वक (शिव जी को) स्नान करा कर पुनः उन्हें चरु का नैवेद्ध अर्पित करके अपने सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन करा कर पूर्व की भाँति कपिल वर्ण का गोमिथुन शिव जी को समर्पित करके मनुष्य सूर्यसायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये।

मार्गशीर्ष महीने में भी विधि पूर्वक दूध तथा घी में पकाये हुये जौ का रात्रि में भोजन करके (अन्त में) पूर्णिमा के दिन पूर्व की भाँति शर्व शम्भु को स्नान करा कर उनकी पूजा करके वेद में पारङ्गत दरिद्र ब्राह्मणों को भोजन करा कर तथा विधि पूर्वक पाण्डुर वर्ण का गोमिथुन (शिव जी को) समर्पित करके मनुष्य सोमलोक प्राप्त करके (वहाँ पर) सोम के साथ आनन्द प्राप्त करता है।

(गीता प्रैॅस द्वारा प्रकाशित कल्याण पत्रिका के एक विशेषाङ्क जो कि लिङ्ग पुराण पर आधारित है से लिया गया)

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